मिटटी का फैंसला


लाल कोठी पर
लगी संगमरमर की फर्श
फर्श पर चांदी का सिंहासन
जिस पर बैठा
कबर में पैर लटकाए
बुड्डा कुबेर
कांपते हुए हाथों से
थामी हुई
सोने की थाली
सोने की कटोरियों में
चांदी के चम्मच
डूबे हुए मूंग की दाल के हलवे में
और पास में
काजू बादाम वाले
दूध का गिलास लेकर
खड़ी है शालियाँ

जीवन के नंदन वन में
जिनकी जिंदगी गुजरती
युधिष्ठर के रथ की तरहां
यथार्थ के धरातल से
इतने उपर
सातवे आसमान पर
कि उनसे
छोटे-बड़े इंसान तो क्या
हिमालय भी नहीं टकरा सकता

मगर, आश्चर्य ,
जो कभी धरती पर नहीं चले
जिनके जूतों पर कभी
धूल तक नहीं जम सकी
उनके पेट में पथरी जम गई


बरबाद हो गए
ईलाज में इस तरहां
जो धरती के उपर चलते थे
युधिष्ठर के रथ की तरहां
वे आजकल
बड़ी तेजी से
धरती के अंदर उतरते जा रहे हैं
सीता की तरहां


मगर
जो झोंपड़ियों में
जन्म लेकर
पीढ़ियों तक
मिट्टी से
उपजाते रहे सोना
वही खरा सोना
हर बार बिकता रहा
उन्हीं महलों की देहलीज पर
सिर्फ
सिर्फ
पुराने कर्ज के ब्याज के बदले
या चंद सिक्कों में


फिर मजबूर होकर
बेबस मजदूर की तरह
लगते रहे
वहीं हरा
सोना उपजाने में

जो हर सर्दी में पीते रहे
मिट्टी की मटकी का पानी
खाते रहे
हण्डिया की सब्जी
मिट्टी के तवे की रोटी
जिसमें मेहमान की तरहां
अक्सर मिलती रही मिटृी

कितना बड़ा आश्चर्य
जो पुरूषार्थ की पाचन-शक्ति से
पहाड़ों को पचा जातें
उनके पेट में कभी मिटृी नहीं जमती
और जिनके जूतों पर
कभी मिटृी नहीं जमीं
कैसे
उनके पेट में पथरी जम जाती

सब कुछ
मिटृी का ही फैंसला है
कि
किसकी
किस तरहां मिटृी पलीत करनी है
और कहां
किस मिटृी से
कैसा
शानदार महल बनाना है।


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