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Ganesh Vandna (गणेश वंदना ) - Paryavaran Par Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD01)





पूजलूँ  लंबोदर को, गाऊ गीत गणेश ।
दोहे सब ऐसे रचो, झुमे देष-विदेश ।

शब्दार्थ  :- नमन करे  = पूजा = अर्चना करना

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज सबसे पहले लम्बोदर महाराज, विन्धविनासक गणपति जी के गीत गीते हुए प्रार्थना कर रहे हैं कि हे प्रभु ! आप हमारी लेखनी को लोकप्रियता प्रदान करें। मुझ पर गणपति महाराज की ऐसी अदृष्य अनुकम्पा होवे  कि इस पुस्तक का लेखन कार्य षीध्र ही पूर्ण हो जाए और यह देष-विदेष में सर्वत्र अपनी आभा विखरेती हुई पर्यावरण प्रेमियों को मार्ग-दर्षन प्रदान करें ।





आज का आदमी


आज का आदमी
अपनी गरीबी के कारण
बहुत कम
और
पडोसियों की तरक्की से

बहुत
ज्यादा दुखी है

अमृत 'वाणी'

भोजन की मात्रा




भोजन की उतनी ही मात्रा अमृत के समान  है, जिसे ग्रहण करने के बाद आप को,
किसी
भी कार्य में बाधा उत्पन्न  नहीं होय |

सच्चे गुरु

सच्चे गुरु को
सच्चा शिष्य मिल जाना
एक नवीन सशक्त क्रांति का
बीजारोपण है

हे खुदा !

हर इंसा की जिंदगी में
कम से कम एक बार
एक ऐसा दौर आना चाहिए कि
उस दौर के दौरान वो शख्स
हर दौर से गुज़र जाना चाहिए |

अमृत 'वाणी'


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सब जानते


सब जानते
तू
भी कभी
मजबूत पहाड़ था ,
आज मिटता-मिटता हो गया
छोटा सा कंकर I
मगर
तनिक भी चिंता मत कर
केवल दो बातें ध्यान रखा कर
पहली बात
मौके
की तलाश में
तुझे रात-दिन फिरना है
दूसरी बात
तुझे
कब कहाँ और किसकी आँख में
कैसे गिरना है I



अमृत 'वाणी '
सेंती चित्तौड़गढ़

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